12 मई हर साल ‘वर्ल्ड नर्स डे’ के रूप में मनाया जाता है. "फ्लोरेंस नाइटिंगेल" दुनिया की सबसे पहली नर्स थी, जिनके याद में उनके जन्मदिन को वर्ल्ड नर्स डे से संबोधित किया जाता है. इन्होंने मरीजों और रोगियों की सेवा की. इन्होंने क्रीमिया युद्ध के दौरान लालटेन लेकर घायल सैनिकों की सेवा दिल से कि थी, जिसके कारण उन्हें ‘लेडी विथ लैंप’ कहा जाता है.
फ्लोरेंस नाइटिंगेल, ब्रिटेन परिवार में 12 मई 1820 को जन्मी, अपनी सेवा के लिए याद की जाती है. 1860 में उन्होंने सेंट टॉमस अस्पताल और नर्सों के लिए ‘नाइटिंगेल’ नामक प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की थी. लंबी उम्र और सेवा के बाद 1910 में 90 वर्ष में उनका देहांत हो गया.
आज जब कोरोना महामारी में जहां रोगियों की संख्या में वृद्धि हो रही है, तो यह नर्स ही है जो खुद की परवाह किए बिना रोगियों की सहायता दिन रात कर रही है. यह सत्य है कि जीवन देने में डॉक्टरों का ही हाथ होता है, लेकिन साथ ही साथ नर्सों का भी योगदान होता है. नर्स ही तो रोगियों की दिन - रात सेवा करती और उन्हें ठिक करने का हर प्रयास करती है. वह खुद के परिवार की चिंता किए बिना, और अपनी जान की परवाह किए बिना, इस कोरोना महामारी से लड़ रही है व लोगों की जान बचा रही है.
इसलिए इस दिन को नर्सों के योगदान के लिए रेखांकित किया जाता है, जिससे दुनिया नर्सों के महत्व से अवगत होती है.
मदर टेरेसा ऐसे है महान लोगों में एक मानी जाती है, जो सिर्फ दूसरों के लिए जीते है. वह एक ऐसी महान महिला थीं जिन्होंने अपना सारा जीवन लोगों की सेवा में ही समर्पित कर दिया था.
लेकिन क्या नर्सों को जो मिलना चाहिए वह पर्याप्त रूप से मिल पाता है? क्या उनकी सेवा के बदले उन्हें वह इज्ज़त दी जाती है जिनकी वह हकदार हैं? हाल ही में आई खबर में यह पता चला कि कई प्राइवेट अस्पताल ऐसे है जो कि वहां काम कर रहीं नर्सों के वेतन में 25 - 30 प्रतिशत की कटौती करने का निर्णय लिया है, साथ ही उनके इंसेंटिव व बोनस पर भी रोक लगा दी गई है, और शिफ्ट का समय भी बढ़ा दिया गया है. इसके पीछे वजह जो भी हो परन्तु नर्सों के खून व पसीने की कमाई पर रोक लगाना सही नहीं है, कोई और तरीका भी निकला जा सकता था.
देश के लिए संपूर्णता व पूरी निष्ठा के साथ काम कर रहीं इन नर्सों को हमारा सलाम.
- अनुकृति प्रिया




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