साहित्य की दुनिया से नवल चाचा का जाना हम सबको रूला गया



जब कोई अपना जाता है तो सारे शब्द गूंगे पड़ जाते हैं। नवल चाचा का जाना वैसा ही है। वे हिन्दी के बड़े आलोचक थे। साहित्य में जो रचा उन्होंने उसे दुनिया जानती है। दुनिया उनके कलम की मुरीद रही है। उनकी कल्पनाशीलता,अदम्य जिजीविषा ही थी कि वे लगातार लिख रहे थे। पिछले २ सालों से वे थम गए थे। जैसे स्याही सूख गई हो। मेरे लिए पिता की तरह थे। जब हम सब बड़े हो रहे थे,दुनिया को जान रहे थे ,समझ रहे थे तो इनलोगों ने  हम सभी युवा साथियों को गढ़ा। जिन्दगी के सुख, दुख के हिस्सेदार रहे। खूबसूरत और ज़हीन आदमी थे। पटना कालेज में जब हमलोग पढ़ते थे तो उनका  छाता और नाक पर रुमाल की खूब चर्चा होती।   उन्हें अपने युवा दिनों से देखती रहीं हूं। पहले कभी भी बच्चों के प्रति अपने प्यार को खुलकर ज़ाहिर नहीं करते थे। पिछले कुछ सालों से उनके भीतर प्यार का जो दरिया था वो उनके बांधे नहीं रुकता। पूर्वा और चिंतन के बारे में खूब बातें करते। हम सब की सुध लेते। मैं उनकी मुलामियत और मुहब्बत में भीगती रहती। पिछली बार उनकी शादी की सालगिरह में हम सब दोस्त इकठ्ठे हुए थे। मैंने चाची को इतना खुश बहुत दिनों बाद देखा था। उनकी हंसी को कैमरे में कैद कर लिया। जब जाने लगी तो चाचा ने मुझे गले से लगाया और मेरी पेशानी चूम ली। मेरे लिए उनका ये सबसे बड़ा उपहार था। क्या मालूम था जिन्दगी इस तरह विदा लेगी। जब हम मिले थे मार्क्सवाद में उनकी गहरी आस्था थी। लंबे समय तक कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े रहे। बाद में उनकी दूरी बढ़ती गई। उन्होंने कम्युनिस्ट आंदोलन के अंतर्विरोध और विडंबनाओं को झेला था। फिर भी मन के कोने में कम्युनिस्टों के लिए हमेशा मुहब्बत बनी रही। वे अपने लेखन में निर्मम आंकलन और आलोचना के लिए मशहूर थे। मनुष्य की गरिमा, न्याय और सच के लिए हमेशा उन्हें लड़ते भिड़ते देखा। दुनिया की नजर में वे बड़े आलोचक नंद किशोर नवल हैं। मेरे लिए मेरे प्रिए चाचा जो हमसे सीधे और सच्चाई से बात करते । जिनके विचार, बिंब और भाव में कोई फांक नहीं था। जो गर्माहट से मिलते और मिलते हुए कहते पता है शकील  मुझे मौत के मुंह से बाहर ले आए मुझे जिन्दगी दी। हम हंसते कहते डाक्टर का काम ही यही है। इसके लिए क्या शुक्रिया। इस बार उन्होंने मौका नहीं दिया। हम सब उन्हें रोक नहीं पाए। वे निकल गए बिना कुछ कहे।  चाचा आप तो हम सब के भीतर बसे हैं। हमारी धड़कनों में।

-निवेदिता 
(संपादक- अंशिका जौहर)

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