संकट की इस घड़ी में मजदूरों संग ये क्या मजाक किया जा रहा है, जहां एक ओर देश के प्रधानमंत्री कहते हैं कि "कारखानों के मालिक अपने मजदूरों व कर्मचारियों के साथ खड़े रहें अर्थात अपने यहां काम करने वाले मजदूरों को काम से न निकालें, उनसे अच्छा व्यवहार करें, उनके प्रति संवेदना रखें।" वहीं दूसरी ओर भाजपा शासित राज्यों (उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश व गुजरात) से वर्तमान 'श्रम कानूनों' को लगातार बदला जा रहा है। श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा करने वाले तमाम श्रम कानूनों को रौंदा जा रहा है। ऐसी स्थिति में दो बातें स्पष्ट हो जातीं हैं- पहला यह कि हमारे प्रधानमंत्री के मूल्यों का स्वयं उनकी ही राजनैतिक पार्टी में पतन हो रहा है या फिर हमारे प्रधानमंत्री मजदूर व गरीब विरोधी हैं और वो दोहरे चरित्र में जीते हैं जहां उनके वक्तव्यों का उनके कर्तव्यों से कोई लेना देना नहीं है।
हम मानते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था ऐसी महामारी की स्थिति में चरमरा सी गई है। लेकिन यह सर्वविदित है कि किसी भी राष्ट्र का मजदूर जो सबसे निचले पायदान पर खड़ा होता है, असल में वह ही देश की अर्थव्यवस्था के साथ वहां के लोगों को बचाए रखता है। क्योंकि वह मजदूर ही है जो अपने पसीने और पांव के छालों की परवाह किए बिना कारखानों में निर्माण कार्य कर रहा होता है। शायद इसीलिए पिछले दिनों 7 मई को कनाडा के प्रधानमंत्री 'जस्टिस ट्रुडो' ने अपने देश के मजदूरों की आय बढ़ाने के लिए 2 बिलियन डॉलर के पैकेज का एलान किया।
लेकिन यदि हम अपने देश भारत की बात करें तो यहां मजदूरों के जीवन का एकमात्र उद्देश्य यह माना जाता है कि एक श्रमिक के श्रम को जानवरों की भाँति अंत तक निचोड़ लिया जाए और बिना उसकी सुरक्षा के इंतजाम के उन्हें कारखानों के भट्ठों में ठूस दिया जाए। इतना ही नहीं बल्कि उनके श्रम के वाज़िब मूल्य के बिना उन्हें सिर्फ दो वक्त भोजन देकर अगले रोज़ फिर से उनके श्रम को मालिक के उन्नति में झोंक दिया जाए।

ऐसे में लॉकडाउन के चलते बीते दिनों श्रम कानूनों में हुए बदलाव हमारे समक्ष यह बात प्रस्तुत करते हैं कि देश की सरकार को सिर्फ अच्छे परिणाम की परिकल्पना है, उनकी समझ इतनी संकरी हो गयी है कि वे यह भी नही समझ पा रही है कि मनुष्य से बड़ा कोई संसाधन नही है। जब एक श्रमिक से उसके एक दिन के श्रम शक्ति से अधिक श्रम लिया जाता है, तब उसके श्रम शक्ति का ह्रास होता है। नीचे आपको कुछ श्रम कानूनों के बारे में बताना चाहती हूं जिनको निम्न राज्यों से हटा दिया गया है:-
◆【उत्तर प्रदेश】
● कारखाना अधिनियम 1948, जो श्रमिकों के स्वास्थ्य से लेकर उनकी सुरक्षा की गारंटी करता था, लेकिन अगले 3 वर्षों(तानाशाही चली तो सदा के लिए) तक रद्द किये गए। अब मजदूर को सिर्फ काम करना है चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों।
● ओद्यौगिक विवादों का निपटारा 1947, इस श्रम कानून को भी समाप्त कर दिया गया है; मतलब अब यदि किसी श्रमिक का शोषण उसका पूंजीपति मालिक करता है, तो श्रमिक के लिए अब कोई ऐसी जगह नही है जहां वह शिकायत दर्ज करा सके।
● श्रम संगठनों(trade unions) को मान्यता देने वाले श्रम कानून भी खत्म कर दिए गए हैं; अर्थात अब मजदूर इकट्ठा होकर अपने शोषण का विरोध भी नही कर सकते न ही अपने मालिक के खिलाफ कुछ बोल सकते हैं।● प्रवासी मजदूरों तथा अनुबंध श्रमिकों (contract labourers) से संबंधित कानून भी रद्द किये गए। अब पूंजीपति मालिकों को जितनी चेष्टा अनुबंध मजदूरों को मनमाने वेतन पर लाए और जब चाहे मजदूरों को काम से निकाले, इसकी जवाबदेही कोई नही लेगा।
◆【 मध्य प्रदेश】
● यहां सरकार ने लेबर इंस्पेक्टर से जुड़े कानून रदद् कर दिए हैं, अर्थात अब यहां के मालिक स्वतंत्र हैं अपने-अपने मजदूरों पर कोड़े बरसाने के लिए। यहाँ के कारखानों अथवा अन्य किसी संस्थानों में जहां श्रम कानून लागू हुआ करता था अब किसी का हस्तक्षेप नहीं होगा, जिन परिस्थितियों में श्रमिकों को मालिक नोच सकता है नोंचे, अब वह स्वतंत्र है।
● 350 से कम श्रमिक रखने वाले उद्योगों को श्रम कानून के बाहर कर दिया गया, मतलब यह समझिये कि यदि किसी जगह 100 श्रमिक काम कर रहे हैं तो उनका मालिक किसी कानून के भीतर नही बंधा है, वह अपने श्रमिकों का देवता है जो खुश होने पर ही कृपा करेगा और यह बात किसी से छिपी नही है कि पूंजीवादी व्यवस्था कभी खुश नही होती वह अंत तक श्रम को निचोड़ती है।
◆【गुजरात】
● यह स्थान ही मानो जो आजकल विचित्र हो गया हो। जहां दूसरे राज्यों में जालिम 3 वर्षों तक स्वतंत्र हैं तो यहां 1200 दिनों अर्थात (3 साल 2 महीने) तक इन जालिमों को छूट हैं लूट का तांडव करने की।
● यहां भी लेबर इंस्पेक्टर की आवश्यकता रदद् कर दी गयी है। कुल मिलाकर देश की बड़ी आबादी जो श्रमिक है, भूमिहीन है अथवा असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत है, अब वे गायों की भांति दुहे जाएंगे और भूख लगने पर सड़कों पर दुत्कार और लाठी खाने को छोड़ दिए जाएंगे।
अगर इकट्ठे श्रम कानूनों में बदलाव की बात करें तो वो हैं-
● कारखाना अधिनियम, 1948
● समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976
● कर्मकार क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923
● प्रसूति हितलाभ अधिनियम, 1961
● दुकान एवम प्रतिष्ठान अधिनियम, 1953
● औधोगिक निपटारा अधिनियम, 1947
ये वे सारे महत्वपूर्ण श्रम क़ानून हैं जो श्रमिकों के हितों की रक्षा करते हैं, किन्तु इन्हें इस प्रकार मरोड़ देना समाज में अशोभनीय भी है और विनाशकारी भी।
इसके अलावा श्रम कानूनों में हुए "कार्य के घंटों" में बढ़ोतरी कहीं से भी सही नहीं है। अगर हम कानूनों के मुताबिक चले तो एक व्यक्ति से एक दिन में 8-9 घंटों से अधिक श्रम नही लिया जा सकता और यदि उससे अतिरिक्त समय(overtime) तक कार्य लिया भी जा रहा है तब भी एक व्यक्ति एक दिन में 10 घंटों से अधिक कार्य नही कर सकता, यह उसके स्वास्थ्य तथा जीवन के अन्य पहलुओं को ध्यान में रखकर लिया गया निर्णय था।
अब यदि "अतिरिक्त कार्य घंटे" के परिश्रमिक के नियमों को जाने तो वह इस प्रकार है कि यदि किसी श्रमिक से उसके कार्य घण्टों से अधिक कार्य लिया जा रहा है तो प्रति घण्टे के हिसाब से उसे उसके तय वेतन के हिसाब से एक घण्टे का दुगुना भुगतान किया जाएगा। अब जबकि "कार्य घण्टों" को ही बढ़ा दिया गया है तो यह कानून भी स्वयं ही निरस्त हो जाता है, और ये मजदूरों के शोषण को बढ़ावा देता है। अब मालिकों को अतिरिक्त कार्य के पैसे भी नही देने पड़ेंगे और एक ही श्रमिक से अधिक से अधिक कार्य लिया जाएगा जो एक मनुष्य होने के नाते श्रमिक के जीवन के कई पहलुओं पर नकारात्मक प्रभाव डालेगा।
अब यदि हम श्रमिक महिलाओं की बात करें तो श्रम कानूनों के रद्द हो जाने के बाद सबसे ज्यादा महिलाएं प्रभावित होंगी। अगर हम भारत में महिला श्रमिक सहभागिता की बात करें तो "Deloitte report" के अनुसार भारत में महिलाओं की भागीदारी 2005 में 37.7% थी जो 2018 में घटकर मात्र 26% रह गई है। भारत की महिला श्रमिकों की बात करें तो 95% या 195 मिलियन महिला श्रमिक आज भी असंगठित क्षेत्रों में कार्य कर रहीं हैं अथवा वे अवैतनिक(unpaid) श्रमिक हैं। ऐसे में "मातृत्व हितलाभ अधिनियम का निरस्त होना महिलाओं के स्वाभिमान तथा आत्मनिर्भरता को कुचलने के समान प्रतीत होता है। आज भी कार्यस्थलों पर महिलाओं की स्थिति दयनीय है, वहीं आए दिन समाचार पत्रों में महिलाओं के साथ हो रहे दुर्व्यवहार की खबरें पढ़ने को मिल ही जाती है लेकिन फिर भी श्रम कानून में बदलाव को लेकर कुछ ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं तब निःसंदेह ही हमारी सरकार महिला विरोधी मालूम पड़ती है और सरकार की खोखली "बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" के नारे की वास्तविकता चिलमन से झांककर चीत्कार करती हुई प्रतीत होती है।
इतना ही नहीं हमारे राष्ट्र में प्रतिभा की कोई कमी नही है, साथ ही प्राकृतिक संसाधनों से भी हम सम्पन्न हैं। परन्तु यदि राष्ट्र की पूँजी पर से विषैले सर्पों को पहचानकर उन्हें किना रे नही किया गया तब हमारा देश अवश्य ही गर्त में चला जाएगा और सम्पूर्ण मानव प्रजाति विनाश के गर्भ में होगी। प्रकृति ने सबको एक जैसा बनाकर भेजा है, यदि प्रकृति से शक्तिशाली होने का अभिमान कोई पालता है तो उसका विनाश अवश्य निकट होता है। भारतीय राजनीतिकारों को अपने हृदय में करुणा जगाने की आवश्यकता है। और बहुत सारे रास्ते हैं देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के, वरना मजदूरों के शोषण से कब तक ऐसे ही धरती संचित होगी।
कृपया पुनः विचार करें।
प्रियंका प्रियदर्शिनी
छात्रा- पटना विश्विद्यालय


Comments
Post a Comment