दहेज या बेटी: कौन ज़्यादा मूल्य रखता है?




दहेज लेना और देना हमारे समाज में बहुत गर्व का विषय माना जाता है जो कि घटिया, बेबुनियाद और अमानवीय है. ऐसे समय में जब हम तेज़ी से आगे बढ़ते हुए देश और समाज में अपने आप को प्रदर्शित करने से चूक नहीं रहे हैं, ऐसे में आज भी हमारे देश और समाज की महिलायें सुरक्षित नहीं हैं.

 तमाम घटनायें हैं जो आज भी महिलाओं पर अत्याचार को लेकर मिल रही हैं. सहम जाता हूं यह सोच कर की क्या यह कभी मेरे परिवार की महिलाओं के साथ नहीं हो सकता? बिल्कुल हो सकता है, क्योंकि हम जिस तरह के सामाजिक संरचना की तरफ़ बढ़ रहे हैं, इस हिसाब से वह दिन दूर नही जब हम बस पत्थर की एक मूर्ति की तरह सिर्फ़ देख ही पा रहे होंगे लेकिन न ज़ुबान चलेगी और न ही हाथ पैर.

आज के दौर में एक ओर हमारे देश की महिलाएं आसमान की बुलंदियों को छू रही हैं, वहीं दूसरी ओर देश के किसी कोने में दहेज के लिए हमारी महिलायें मौत के घाट उतारी जा रही हैं.

घटना है बिहार के मिथिला क्षेत्र की जहां एक लड़की की शादी होती है और अगले ही दिन उसे मारना पीटना शुरू हो जाता है वो भी सिर्फ़ दहेज में एक गाड़ी ना मिल पाने की वजह से.
जब लड़की ने अपने घर में यह बात बताई तो घर के लोग भी परेशान होने लगे. कुछ दिन सब ठीक रहा, पर कुछ ही दिनों बाद उसके साथ मारपीट शुरू हो गई. फिर उस नव विवाहित लड़की ने अपने घर एक चिट्ठी लिखा. आज हमारा देश सबसे ज्यादा सेलफोन इस्तेमाल करने वाला देश है. ऐसे समय में उस नव विवाहित लड़की को चिट्ठी लिखनी पड़ी क्योंकि ससुराल वालों ने उसका खाना पीना और सबसे बात चीत सब बंद करा दिया था.

फिर कुछ दिनों बाद उस नव विवाहित लड़की के घर के लोग उससे मिलने उसके ससुराल पहुंचे तो उसे अपने माता पिता और भाई से भी मिलने नहीं दिया गया और उन सबको दरवाजे से ही रवाना कर दिया गया. कुछ दिनों बाद उसे कभी गर्म सरिए से तो कभी गर्म तवे से जलाया गया.
इन सब क्रियाकलापों में लड़की के ससुराल पक्ष के सभी लोग शामिल थे. अंततः वही हुआ जिसका सबको डर था. उस नई नवेली दुल्हन की लाश एक सड़क के किनारे मिली जिसके बदन पर ढंग से कपड़े तक नही थे.


जब उस लड़की की शादी हुई होगी तो उसने क्या-क्या  सपने सजाये होंगे लेकिन सिर्फ़ एक बुलेट गाड़ी के लिए एक जान की कीमत कैसे नही समझ पाए वह लोग.
आसपास के लोगों पर धिक्कार है जो यह सब होते हुए भी चुप थे. माना की सामने से विरोध करने में हज़ारों परेशानियां रही होंगी पर देश के एक ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते पुलिस को खबर तो पंहुचा ही सकते थे.
उन लोगों को दिल से सलाम है जो उस बहादुर लड़की को न्याय दिलाने के लिए लड़ रहे हैं.

लिखना तो बहुत कुछ था लेकिन इस घटना के बाद सदमे में हूं. अपने आप को इस घृणित समाज का एक हिस्सा मानने में शर्म आ रही है.

मेरा यह लेख है किसी विशेष व्यक्ति या समुदाय के लिए नही है. यह लेख मैंने खुद इस त्वरित मामले की जानकारी के आधार पर लिखा है. यह अगर किसी के लेख से मेल खाता है तो यह सिर्फ़ एक संयोग होगा जिसके लिए मैं माफ़ी चाहता हूं.

यह घटना अगस्त 2018 की है जो कि मेरे गृह जिले मधुबनी के एक गांव की है.

अनुराग कुमार 

Comments