लंबे वक्त से पत्रकारिता और मीडिया समाज के विभिन्न वर्गों, व्यक्तियों और सरकार की संस्थाओं के बीच मध्यस्ता का कार्य कर रही है। इसलिए मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है। लेकिन वर्तमान समय में मीडिया में खबरें बाजार का माहौल देखकर लिखी जाती है तो वहीं जनता की आवाज कही जाने वाली मीडिया में अब स्पॉन्सर्स के पैसे तय करते हैं कि जनता की आवाज़ कितनी ऊंची होनी चाहिए।
प्रारंभ से ही जनता देश की वर्तमान परिस्थितियों को जानने के लिए मीडिया पर भरोसा करती आ रही है लेकिन आज जनता मीडिया से जुड़े लोगों खासकर संपादक और संवाददाताओं से पूछना चाहती है कि क्या मीडिया के पास अब समाज को जागरूक करने के लिए कोई और मुद्दा नही बचा है?
वर्तमान आंकड़ों पर थोड़ी नजर डाली जाए तो जानेंगे कि जी न्यूज के लीड एंकर सुधीर चौधरी पर सूचना के बदले नफ़रत का प्रचार-प्रसार करने के लिए एफआईआर दर्ज हुई है।
वहीं रिपब्लिक भारत के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी पर लाइव टीवी के दौरान सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ अपमानजनक टिप्पणी करने पर केस दर्ज़ कराया गया था। अब ऐसे में अर्नब गोस्वामी से पूछता है भारत कि क्या सोनिया गांधी का इटली से होना इतना ज़रूरी मुद्दा है कि उसके आगे देश की जनता के बेरोज़गारी, गरीबी, भूखमरी, चाइल्ड ट्रैफिकिंग जैसे अन्य मुद्दे गायब ही कर दिए गए। पूछता है भारत कि हर रोज़ न जाने कितने लोग भुखमरी का शिकार होते है, देश के अधिकांश वर्ग के लोग बेरोज़गारी से जूझ रहे है जिनके पास कमाई का कोई साधन नही है। वहीं आज भी 36 करोड़ लोग ऐसे है जो तीन वक़्त का खाना जुटा पाने में भी असमर्थ है तो कहां है मीडिया की गैलरी में यह मुद्दे। क्यों नही वह इन मुद्दे पर सरकार से बात करती है? लॉकडाउन में ना जाने कितने ही मज़दूरों ने अपने जान गवां दी, क्यों मीडिया सरकार से यह सवाल नहीं पूछती है? वर्तमान समय में मीडिया क्यों सिर्फ सरकार की वाहवाही करने तक सीमित है क्या वह अपने कर्तव्य से भटक गई है या मीडिया कॉपोरेट के हाथों बिक गई है।
- अनुकृति प्रिया
(सम्पादक- अंशिका जौहरी)


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